राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी की जांच के लिए जो SIT बनाई गई थी, उसने अपनी प्राथमिक जांच रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। रिपोर्ट शुरुआती है इसलिए जांच की आंच राम मंदिर ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों तक नहीं पहुंची है। ट्रस्ट के सचिव चंपत राय इस सारे विवाद के बाद पहली बार शेषावतार मंदिर के ध्वाजारोहण समारोह के मंच पर नजर आए। ट्रस्ट से जुड़े जितने लोग शक के घेरे में हैं, वे सब एक साथ दिखाई दिए, मानो कुछ हुआ ही न हो।
राम मंदिर के दान पात्रों में डाले गए रुपये पैसे की चोरी होती रही, ऐसा कैसे संभव है कि व्यवस्था करने वालों को पता नहीं चला? गिनती के जो नियम कायदे थे, उनका पालन नहीं हुआ, ऐसा कैसे हो सकता है कि व्यवस्था करने वालों को इसका भी पता ही नहीं चला?
जेबों में नोटों की गड्डियां भर-भरकर ले जाने वालों की तलाशी नहीं हुई, व्यवस्था करने वालों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? गिनती करने वालों ने मकान बना लिए, दुकानें खरीद लीं, नई गाड़ियां ले लीं, सारी दुनिया ने देखा पर ट्रस्ट के प्रबंधन को दिखाई नहीं दिया।
जब कुछ लोगों ने आकर चोरी की खबर दी, तो भी ट्रस्ट के कर्ता-धर्ता ने उस पर यकीन नहीं किया। लोगों के घर से कैश मिला, बैंक खाते में जमा राशि मिली तो भी ट्रस्ट के मुखिया को नहीं लगा कि उनके चहेते प्रभु राम के घर में चोरी कर सकते हैं।
चंपत राय ने SIT बनाने के लिए चिट्ठी लिख दी, खुद गवाही दे दी, SIT को सब बता दिया और मान कर बैठ गए कि उनका काम पूरा हो गया लेकिन पिक्चर अभी बाकी है। SIT की शुरुआती रिपोर्ट आई है। असली जांच तो अभी होनी है। किस किसने अपने रिश्तेदारों को गिनती के काम में रखवाया?
किसने CEO की नियुक्ति को रुकवाया? किसने मिंट कॉरपोरेशन को बाहर भगाया? किसने भगवान राम के दान पात्रों में चोरी की जानकारी को छुपाया? इसकी भी जांच होनी चाहिए। पाप में जो जो भागीदार हैं, सबका हिसाब होना चाहिए।
मुझे तो हैरानी इस बात पर है कि चंपत राय ने रामलला के दरबार में खड़े होकर चढ़ावे में चोरी की कोई बात नहीं की। उन्होंने लखनऊ के अग्निकांड का शिकार हुए लोगों की आत्म की शान्ति के लिए प्रार्थना तो की लेकिन चढ़ावे में चोरी करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा मिले, रामलला से इसकी प्रार्थना तक नहीं की।
कोचिंग सेंटर्स या मौत का कुआं?
लखनऊ के गेमिंग जोन में 15 नौजवानों की अग्निकांड में मौत के बाद प्रशासन जागा है। पुलिस ने बिल्डिंग के मालिक, Pet Shop के मालिक, हूपर्स गेमिंग जोन और एनिमेशन एकेडमी के संचालक और आईटी कंपनी चलाने वाले सुरेश साहू को गिरफ्तार किया है। अभी दो अन्य फरार हैं।
लखनऊ विकास प्राधिकरण, फायर ब्रिगेड और बिजली विभाग के चार अफसरों को निलम्बित किया गया है। प्राधिकारण ने बिल्डिंग मालिक को 15 दिन के अंदर इमारत गिराने का आदेश दिया है।
ये हाल सिर्फ लखनऊ की एक बिल्डिंग का नहीं हैं। देश में जितने भी कोचिंग सेंटर्स चल रहे हैं, जितनी कमर्शियल बिल्डिंग्स हैं, उनमें से ज्यादातर में फायर सेफ्टी का कोई इंतजाम नहीं है, इमरजेंसी एक्जिट की कोई व्यवस्था नहीं हैं।
लखनऊ में हादसा हुआ तो अफसर जागे, पूरे देश में कोचिंग सेंटर्स पर छापे शुरू हो गए, यूपी, बिहार, राजस्थान से गुजरात तक अब कोचिंग सेंटर्स और गेमिंग ज़ोन का सिक्योरिटी ऑडिट हो रहा है और हर जगह सुरक्षा इंतज़ामों में लापरवाही दिख रही है।
कानपुर विकास प्राधिकरण की टीमों ने 16 अवैध कोचिंग संस्थानों और व्यापारिक संस्थानों को सील कर दिया। ये हालत किसी एक शहर की या किसी एक कोचिंग सेंटर की नहीं है। हर जगह यही हाल है। इंडिया टीवी रिपोर्टर्स ने अहमदाबाद, जयपुर, पटना, गोरखपुर जैसे कई शहरों में कोचिंग सेंटर्स का मुआयना किया, हर जगह फायर सेफ्टी का कोई पुख्ता इंतज़ाम नहीं था।
पूरे देश में कोचिंग सेंटर्स का मतलब है, न प्रॉपर बिल्डिंग, न इमरजेंसी एग्जिट और न फायर सेफ्टी। ये सिर्फ कमाई के अड्डे हैं जिनमें पढ़ने वालों की सुरक्षा का जरा भी ध्यान नहीं रखा जाता। बात सिर्फ कोचिंग सेंटर्स तक सीमित नहीं है। इन सेंटर्स में पढ़ने वाले छात्र जहां रहते हैं, वो कमरे भी सेफ नहीं हैं, उन इमारतों में भी आग लगती है, बेसमेंट में पानी भरता है। वहां भी कई बार छात्रों की मौत हुई है।
आज कोचिंग सेंटर्स में सेफ्टी को लेकर जो रिपोर्ट्स आई हैं, उनको आधार बनाकर पूरे देश में कोचिंग सेंटर्स और हॉस्टल सुविधाओं का ऑडिट होना चाहिए और गाइडलाइन्स बनाई जानी चाहिए, जिनका सख्ती से पालन कराना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी हो।
NEET के मुन्नाभाई: कैसे पकड़े गए डॉक्टर?
बिहार के लखीसराय में NEET री-एग्ज़ाम के दौरान असली परीक्षार्थियों की जगह 9 MBBS छात्रों को परीक्षा देते समय गिरफ्तार किया गया। बिहार पुलिस भले ही ये दावा करे कि उसने NEET में पहुंचे सारे 'मुन्ना भाईयों' को पकड़ा लेकिन हकीकत ये है कि पुलिस को इस खेल की हवा तक नहीं थी।
जब परीक्षा शुरू हो चुकी थी, उसी वक्त दोपहर में बिहार पुलिस के मुख्यालय और NTA को एक अनजान शख्स का मेल मिला जिसमें बताया गया था कि लखीसराय के केंद्रीय विद्यालय में NEET का जो सेंटर हैं , उसमें असली परीक्षार्थी मधुप्रिया की जगह BHU में नर्सिंग की पढ़ाई कर रही पूनम परीक्षा दे रही है।
तब पुलिस हरकत में आई, पूनम को पकड़ा। पूनम ने सच उगल दिया और उसके बाद MBBS के 9 छात्र दूसरे परीक्षार्थियों की जगह इम्तहान देते हुए पक़ड़े गए। दरअसल नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने जिस EDCIL कंपनी को स्टूडेंट्स के बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण का ठेका दिया था उसने ये काम इनोवेटिव व्यू नाम की एक कंपनी को सौंप दिया लेकिन मंगलवार को पता चला कि इस कंपनी को 2022 में उत्तर प्रदेश सरकार ने ब्लैकलिस्ट किया था।
2025 में झारखंड और तमिलनाडु की सरकारों ने भी इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट में डाल दिया था। फिर भी NEET री-एग्ज़ाम के दौरान इस कंपनी को छात्रों के बायोमेट्रिक्स चेकिंग का ठेका दे दिया गया। इस कंपनी ने बायोमेट्रिक चेक करने के लिए, पांच-पांच सौ रुपए में लोकल लोगों को नियुक्त किया था।
इन लोगों ने पैसे लेकर असली परीक्षार्थियों की जगह देश के अलग अलग हिस्सों से बुलाए गए MBBS के नौ छात्रों का परीक्षा केंद्रों में प्रवेश करा दिया। कंपनी के लोकल स्टाफ़ ने असली परीक्षार्थियों के बायोमेट्रिक तीनों परीक्षा केंद्रों से दूर खड़ी एक कार में लिए। जब बायोमैट्रिक ऑथेन्टिकेशन हो गया तो असली परीक्षार्थियों की जगह परीक्षा देने के लिए MBBS छात्रों को परीक्षा केंद्र में भेज दिया।
इस मामले में पुलिस ने एक परीक्षार्थी और बायोमेट्रिक कंपनी के 18 कर्मचारियों समेत कुल 30 लोगों को गिरफ्तार किया है। इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड पटना मेडिकल कॉलेज का तृतीय वर्ष का एक छात्र अश्विनी कुमार है। लखीसराय में NEET परीक्षा देने पहुंचे 9 दूसरे MBBS छात्रों के ब्यौरे भी चौंकाने वाले हैं।
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी मेडिकल कॉलेज में MBBS फोर्थ ईयर का छात्र मनतोष कुमार, संजीत की जगह परीक्षा देने पहुंचा था। गया के AN मेडिकल कालेज में MBBS फोर्थ ईयर का छात्र विवेक कुमार भी परीक्षा देने पहुंचा, पर पकड़ा गया।
सतना मेडिकल कॉलेज में फर्स्ट ईयर का छात्र हिमांशु कुमार, शुभम वर्मा की जगह परीक्षा देने आया था। AIIMS रायबरेली में फोर्थ ईयर का छात्र सौरभ झा, ईशान सिंह की जगह परीक्षा देने गया था। BHU में नर्सिंग का कोर्स कर रही पूनम कुमारी, मधु प्रिया बनकर परीक्षा देने लखीसराय आई थी।
दिल्ली के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज में MBBS की इंटर्नशिप कर रहा अमन अग्रवाल भी इस रैकेट का हिस्सा था। ओडिशा के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में आयुर्वेद की पढ़ाई कर रही चंचल कुमारी, लखीसराय में नंदिनी राज की जगह परीक्षा देने पहुंची थी। इन सब छात्रों को पटना के अश्विनी कुमार ने जमा किया था।
एक-एक नीट परीक्षार्थी को पास कराने के लिए 60 लाख रुपए की मांग की गई थी, इसमें से 25 लाख रुपए अश्विनी कुमार को मिलने थे। इनके साथ दो दलाल भी पुलिस ने पकड़े हैं। लेकिन इस सवाल का जवाब अब तक नहीं मिला है कि पैसों के लालच में उन मेडिकल छात्रों ने अपना करियर क्यों खराब किया, जबकि वो डॉक्टर बनने वाले थे?
पकड़े गए कई MBBS छात्रों का बैकग्राउंड मैंने पता किया। मालूम हुआ कि ज्यादातर मिडिल क्लास फैमिली के हैं। कुछ तो बहुत गरीब हैं। जो इस खेल का मास्टर माइंड है, उसके पिता किसान हैं। उन्होंने बेटे को डॉक्टर बनाने के लिए अपनी ज़मीन तक बेच दी। बेटा मेडिकल की आधी पढ़ाई पूरी कर चुका था। माता पिता सोच रहे थे कि बेटा डॉक्टर बन जाएगा तो उनकी मेहनत सफल हो जाएगी लेकिन बेटा जेल पहुंच गया। (रजत शर्मा)
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